खोया खोया चाँद .....खुला आसमान ...आंखों में सारी रात जायेगी ।
एक खुबसूरत आवाज और वो भी रफी साहब की .....मन भरता ही नही क्या करे ।
देवानंद ने गाने को अमर बना दिया है ..... शरीर तो देखिये ..कितनी बेचैनी है ।
हाव भाव कमाल के है .....बड़ी ही खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है यह गाना ।
प्रेमिका से बिछड़ने पर जो दर्द है उस दर्द को आवाज में रफी साहब ने और
देवानंद साहब ने परदे पर बखूबी उतारा है । आप भी देखिये .......
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Tuesday, May 5, 2009
Thursday, March 12, 2009
माझी और किनारा
मुकेश की आवाज में मुझे ''माझी नैया ढूढे किनारा गीत काफी अच्छा लगता है । अभी सुन ही रहा हूँ। मेरी जिंदगी भी एक माझी की तरह ही है ... जो लगातार किनारे की तलास कर रहा है .....अफ्शोश अभी तक नही मिला ।
खोज अभी जारी है । आशा और निराशा की किरणों ने मन को बेचैन कर दिया है । छल-छल बहती जीवन-धारा ही अब मेरा संगीत है । किसी ना किसी की खोज में है...... ये जग सारा । एक लाइन है कभी ना कभी तो समझोगे तुम ये इशारा.... मांझी का इशारा ।
॥कभी ना कभी तो मिलन होगा, तुमसे हमारा ।। मांझी नैया ........ ढूंढें किनारा ।
Monday, March 9, 2009
रात हमारी तो.....
रतिया कारी कारी रतिया
रतिया अंधियारी रतिया
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली है
चुप्पी की बिरह है
झींगुर का बाजे साथ
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली है
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज
अँधेरा रूठा है
अँधेरा बैठा है
गुमसुम सा कोने मैं बैठा हैं
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली हैं
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज
[अँधेरा पागल है
कितना घनेरा हैं
चुभता है, डसता है
फिर भी वो मेरा हैं] - २
उसकी ही गोदी में
सर रखके सोना हैं
उसकी ही बाहों में
चुपके से रोना है
आँखों से काजल बन
बहता अँधेरा आज
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली है
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज
अँधेरा रूठा है
अँधेरा बैठा है
गुमसुम सा,
कोने में बैठा है
यह गाना मुझे काफी अच्छा लगता है .....अँधेरा अब बुरा नही लगता ....शान्ति मिलती है । दिन के भाग दौड़ के बाद अंधेरे शुकून मिलता है ।
रतिया अंधियारी रतिया
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली है
चुप्पी की बिरह है
झींगुर का बाजे साथ
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली है
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज
अँधेरा रूठा है
अँधेरा बैठा है
गुमसुम सा कोने मैं बैठा हैं
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली हैं
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज
[अँधेरा पागल है
कितना घनेरा हैं
चुभता है, डसता है
फिर भी वो मेरा हैं] - २
उसकी ही गोदी में
सर रखके सोना हैं
उसकी ही बाहों में
चुपके से रोना है
आँखों से काजल बन
बहता अँधेरा आज
रात हमारी तो
चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद
आई वो अकेली है
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बातें आज
अँधेरा रूठा है
अँधेरा बैठा है
गुमसुम सा,
कोने में बैठा है
यह गाना मुझे काफी अच्छा लगता है .....अँधेरा अब बुरा नही लगता ....शान्ति मिलती है । दिन के भाग दौड़ के बाद अंधेरे शुकून मिलता है ।
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