Sunday, February 15, 2009

खामोश सी है ....... जिंदगी .....



इन लमहों के दामन में
पाकीज़ा से रिश्ते हैं
कोई कलमा मोहब्बत का
दोहराते फरिश्ते हैं

खामोश सी है ज़मीन हैरान सा फलक़ है
इक नूर ही नूर सा अब आसमान तलक है
नग्मे ही नग्मे हैं जागती सोती फिज़ाओं में
हुस्न है सारी अदाओं में
इश्क़ है जैसे हवाओं में

कैसा ये इश्क़ है
कैसा ये ख्वाब है
कैसे जज़्बात का उमड़ा सैलाब है
दिन बदले रातें बदलीं, बातें बदलीं
जीने के अंदाज़ ही बदले हैं
इन लमहों के दामन में ...

समय ने ये क्या किया
बदल दी है काया
तुम्हें मैने पा लिया
मुझे तुमने पाया
मिले देखो ऍसे हैं हम
कि दो सुर हो जैसे मद्धम
कोई ज्यादा ना कोई कम
किसी आग में.. कि प्रेम आग में
जलते दोनो ही थे
तन भी है मन भी
मन भी है तन भी

मेरे ख्वाबों के इस गुलिस्ताँ में
तुमसे ही तो बहार छाई है
फूलों में रंग मेरे थे लेकिन
इनमें खुशबू तुम्हीं से आई है

क्यूँ है ये आरज़ू
क्यूँ है ये जुस्तज़ू
क्यूँ दिल बेचैन है
क्यूँ दिल बेताब है

दिन बदले रातें बदलीं, बातें बदलीं
जीने के अंदाज़ ही बदले हैं

इन लमहों के दामन में ....

नग्मे ही नग्मे हैं जागती सोती फिज़ाओं में...
इश्क़ है जैसे हवाओं में.............







1 comment:

Shamikh Faraz said...

bahut khubsurat likhte hain aap. mubarakbad. aapne apne intro me likha hai k aap writting me intrested hain agar aap chahen to mere blog ke lie koi prerna se bhari hui kavita bhej sakte hai. aur han agar waqt mile to mere pe bhi aayen.
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